कल हिंदी दिवस था, कल लिख नहीं पाया कुच्छ हिंदी में, सोंचा आज कुच्छ लिखा जाए ,लेकिन क्या? बचपन से ही हिंदी उतनी अच्छी नही रही,आज तक हम 'ई' की मात्रा सही से नहीं लगा पाते ,इसके लिए कई बार डंडे भी खाने पड़े हैं लेकिन ई की मात्रा अब भी उतना ही परेशान करती है जितना पहले करती थी.
हिंदी में बोलने का शौक बहुत रहा है मतलब बोलने से कहीं ज्यादा भाषण देने का रहा है अगर कोई बोल दे की दिन भर हिंदी में कुच्छ न कुच्छ बोलना है तो कसम सोनिया गाँधी की एक दिन एक्स्ट्रा बोल दें हम ,लेकिन जब बात होती है भासा के नियंत्रण पर तो सोंच में पड़ जाता हूँ की अगर ४-४ कोस में भाषा बदलती है तो भाषा को ले कर क्यों इतना परेशान होना . जी बात ये है की इस देश में हिंदी भाषा को ले के कोई परेशान नही होता (आपके हिंदी अद्ध्यापक को छोड़ कर),आप जितना भी ख़राब हिंदी बोल लीजिये कोई नही टोकेगा पर संभल जाइये वहां पर जहाँ आप अंग्रेजी बोलने वाले हैं क्यूंकि इस उधार की भाषा के रखवाले कदम कदम पे खड़े हैं,जैसे ही आपने एक भी ग्रामर में मिस्टेक किया वैसे ही आपके उपर दो चार अंग्रेजी के पहरेदार डंडे तो अवश्य गिरा देंगे , हमें तो बड़ा डर लगता है भाई इन सभी रक्षको से ,इसीलिए थोड़ा कम ही बोलते हैं अंग्रेज़ी, क्यूंकि अपनी भाषा से ही काम चल जाता है जी कहिये तो काम चला लेते हैं. इतने दिन हिंदी में बिताने के बाद भी हिंदी से जूझ रहे हैं उसके बाद भी कहीं न कहीं हिंदी की एक अलग जगह है इस हिंदुस्तानी दिल मे,मौका मिले तो हिंदी में कम से कम एक दो पेज तो अवश्य लिख लीजिये ,ये ऐसी भासा है जो आपको आपके अस्तित्व से जोड़ती है, आपको समूचे देश से जोड़ती है.
जय हिन्द जय हिंदी !!!!!!!
