रविवार, 15 सितंबर 2013

कल हिंदी दिवस था, कल लिख नहीं पाया कुच्छ हिंदी में, सोंचा आज कुच्छ लिखा जाए ,लेकिन क्या? बचपन से ही हिंदी उतनी अच्छी नही रही,आज तक हम '' की मात्रा सही से नहीं लगा पाते ,इसके लिए कई बार डंडे भी खाने पड़े हैं लेकिन की मात्रा अब भी उतना ही परेशान करती है जितना पहले करती थी.

हिंदी में बोलने का शौक बहुत रहा है मतलब बोलने से कहीं ज्यादा भाषण देने का रहा है अगर कोई बोल दे की दिन भर हिंदी में कुच्छ कुच्छ बोलना है तो कसम सोनिया गाँधी की एक दिन एक्स्ट्रा बोल दें हम ,लेकिन जब बात होती   है भासा के नियंत्रण पर तो सोंच में पड़ जाता हूँ की अगर - कोस में भाषा बदलती है तो भाषा को ले कर क्यों इतना  परेशान होना . जी बात ये है की इस देश में हिंदी भाषा को ले के कोई परेशान नही होता (आपके हिंदी अद्ध्यापक को छोड़ कर),आप जितना भी ख़राब हिंदी बोल लीजिये कोई नही टोकेगा पर संभल जाइये वहां पर जहाँ आप अंग्रेजी बोलने वाले हैं क्यूंकि  इस उधार की भाषा के रखवाले कदम कदम पे खड़े हैं,जैसे ही आपने एक भी ग्रामर में मिस्टेक किया वैसे ही आपके उपर दो चार अंग्रेजी के पहरेदार डंडे तो अवश्य गिरा देंगे , हमें तो बड़ा डर लगता है भाई  इन सभी रक्षको से ,इसीलिए थोड़ा कम ही बोलते हैं अंग्रेज़ी, क्यूंकि अपनी भाषा से ही काम चल जाता है जी कहिये तो काम चला लेते हैं. इतने दिन हिंदी में बिताने के बाद भी हिंदी से जूझ रहे हैं उसके बाद भी कहीं कहीं हिंदी की एक अलग जगह है इस हिंदुस्तानी दिल मे,मौका मिले  तो हिंदी में कम से कम एक दो पेज तो अवश्य लिख लीजिये ,ये ऐसी भासा है जो आपको  आपके अस्तित्व से जोड़ती है, आपको समूचे देश से जोड़ती है.

जय हिन्द जय हिंदी !!!!!!!

सोमवार, 20 दिसंबर 2010

संग्राम


कल रात सुर संग्राम देखने गया था २०० रूपये का ब्लैक में पास का जुगाड़ किया  पर लेट होने के कारन पीछे ही खड़ा होना पड़ा .छात्र जो अन्दर नहीं घुश पाए थे वे धीरे धीरे अपना उत्तेजित रूप दिखाने लगे .पहले पीछे  के गड़े गए बांस टूटे फिर कांटेदार तर वाली फेंसिंग भी उखड दी गयी ये सब प्रशाशन देखती रही क्योंकि इससे  प्रोग्राम ख़राब हो जाता .पर जैसे ही मुन्नी बदनाम हुई वैसे ही गाँधी मैदान भी बदनाम हो गया पुलिस को दोड़ाया गया और पुलिस डोडती रही .आगजनी हुई और सुर संग्राम सिर्फ एक संग्राम बन के रह गया .प्रोग्राम को बंद को दिया गया .जब सब कुच्छ सांत हो गया तो पुलिस अपना काम करने आई और कई राहगीरों को दौड़ा दौड़ा के मारा .और रात भर बेगुनाहों पर पुलिस ने अपना गुस्सा उतरा .क्या किसी ने ये जानना चाहा की ये क्यों और कैसे हुआ ...........ये सोचने की जरूरत है...!!!!!!

शुक्रवार, 20 अगस्त 2010

dhanwan delhi...

khub kamaya paisa hamne ,
delhi hi bhagwan hai..
delhi me khela  khel ka khel,
kyoki delhi aaj dhanwan hai.
hame kya matlab un garibo se,
jo delhi me virajman hain..
desh ki ijjat kya hoti hai,
hum kya jaane ,humne to bas yehi sikha hai ki,
mera desh mahan hai!!!!!!!